श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 1: विराटनगरमें अज्ञातवास करनेके लिये पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा युधिष्ठिरके द्वारा अपने भावी कार्यक्रमका दिग्दर्शन  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.1.22 
न दु:खमुचितं किञ्चिद् राजन् वेद यथा जन:।
स इमामापदं प्राप्य कथं घोरां तरिष्यसि॥ २२॥
 
 
अनुवाद
राजा! यह उचित नहीं है कि आप साधारण मनुष्यों के समान किसी प्रकार का दुःख भोगें; अतः इस घोर संकट में पड़कर आप उसका निवारण कैसे कर सकेंगे?॥ 22॥
 
King! It is not right that you should experience any kind of pain like ordinary people; so having fallen into this grave difficulty, how will you overcome it?॥ 22॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas