श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 1: विराटनगरमें अज्ञातवास करनेके लिये पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा युधिष्ठिरके द्वारा अपने भावी कार्यक्रमका दिग्दर्शन  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  4.1.2-3 
जनमेजय उवाच
कथं विराटनगरे मम पूर्वपितामहा:।
अज्ञातवासमुषिता दुर्योधनभयार्दिता:॥ २॥
पतिव्रता महाभागा सततं ब्रह्मवादिनी।
द्रौपदी च कथं ब्रह्मन्नज्ञाता दु:खितावसत्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने पूछा - ब्रह्मन्! दुर्योधन के भय से पीड़ित मेरे पितामह पाण्डवों ने विराटनगर में अपने अज्ञातवास का समय किस प्रकार व्यतीत किया तथा परम सौभाग्यशाली पतिव्रता द्रौपदी, जो सदैव ब्रह्मस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण का नाम जपती रहती थी, दुःख में पड़ी हुई भी वहाँ अज्ञातवास में कैसे रह सकी? 2-3॥
 
Janamejaya asked – Brahmin! How did my great grandfather Pandavas, suffering from the fear of Duryodhana, spend the time of their unknown abode in Viratnagar and how could Draupadi, the most fortunate husband and devotee, who always chanted the name of Lord Krishna in the form of Brahma, while lying in sorrow, stay there keeping herself unknown? 2-3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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