श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 1: विराटनगरमें अज्ञातवास करनेके लिये पाण्डवोंकी गुप्त मन्त्रणा तथा युधिष्ठिरके द्वारा अपने भावी कार्यक्रमका दिग्दर्शन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.1.17 
मत्स्यो विराटो बलवानभिरक्तोऽथ पाण्डवान्।
धर्मशीलो वदान्यश्च वृद्धश्च सततं प्रिय:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
[तुमने जिन देशों का उल्लेख किया है, उनमें] मत्स्य देश का राजा विराट बड़ा बलवान है और पाण्डवों पर स्नेह रखता है; साथ ही वह स्वभाव से ही गुणवान, वृद्ध, उदार और हम लोगों को सदैव प्रिय है॥ 17॥
 
[Among the countries you mentioned] King Virata of Matsya country is very powerful and has affection for the Pandavas; besides, he is by nature virtuous, old, generous and always dear to us.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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