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mahabharat 3.99.9: "अब वह बाहर कैसे आ सकता है? मैंने (प्रजा के हित के लिए) उस राक्षस को पचा लिया है।" इल्वल को महादैत्य वातापिका को पचा हुआ देखकर बड़ा दुःख हुआ।   |   mahabharat अध्याय 3.99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  3.99.9 
कुतो निष्क्रमितुं शक्तो मया जीर्णस्तु सोऽसुर:।
इल्वलस्तु विषण्णोऽभूद् दृष्ट्वा जीर्णं महासुरम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
"अब वह बाहर कैसे आ सकता है? मैंने (प्रजा के हित के लिए) उस राक्षस को पचा लिया है।" इल्वल को महादैत्य वातापिका को पचा हुआ देखकर बड़ा दुःख हुआ।
 
"How can he come out now? I have digested that demon (for the good of the people)." Ilval was very sad to see the great demon Vaatapika digested.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)