श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 61-62
 
 
श्लोक  3.99.61-62 
तत: स भगवान् विष्णुस्तं वै बाणं मुमोच ह।
शुष्काशनिसमाकीर्णं महोल्काभिश्च भारत॥ ६१॥
पांसुवर्षेण महता मेघवर्षैश्च भूतलम्।
भूमिकम्पैश्च निर्घातैर्नादैश्च विपुलैरपि॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् भगवान विष्णु अवतार श्री रामचन्द्रजी ने वह बाण छोड़ा। भारत! उस समय समस्त पृथ्वी मेघहीन होकर बिजली और विशाल उल्काओं से आच्छादित प्रतीत हो रही थी। प्रचण्ड आँधी उठी और सर्वत्र धूल की वर्षा होने लगी। तत्पश्चात् बादल घिर आए और पृथ्वी पर मूसलाधार वर्षा होने लगी। बार-बार भूकम्प आने लगे। गड़गड़ाहट और अन्य भयंकर प्रलयंकारी ध्वनियाँ गूँजने लगीं। 61-62।
 
Thereafter Lord Vishnu incarnate Shri Ramchandraji released that arrow. Bhaarat! At that time the entire earth seemed to be covered with lightning and huge meteors without any clouds. A strong storm arose and dust started raining everywhere. Then clouds gathered and torrential rain started falling on the earth. Repeated earthquakes started happening. Thunder and other terrifying sounds of havoc started resounding. 61-62.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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