श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  3.99.54 
लोमश उवाच
एतच्छ्रुत्वाब्रवीद् राम: प्रदीप्त इव मन्युना।
श्रूयते क्षम्यते चैव दर्पपूर्णोऽसि भार्गव॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
लोमशजी कहते हैं- हे राजन! यह सुनकर श्री रामचंद्रजी क्रोधित होकर बोले- 'भृगुनंदन! तुम बड़े अभिमानी हो। मैं तुम्हारे कठोर वचन सुनकर तुम्हें क्षमा कर दूँगा।'
 
Lomashji says- O King! On hearing this, Shri Ramchandraji became furious and said- 'Bhrigu Nandan! You are very arrogant. I will listen to your harsh words and then forgive you.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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