श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 52-53
 
 
श्लोक  3.99.52-53 
तस्य शब्दस्य भूतानि वित्रसन्त्यशनेरिव।
अथाब्रवीत् तदा रामो रामं दाशरथिस्तदा॥ ५२॥
इदमारोपितं ब्रह्मन् किमन्यत् करवाणि ते।
तस्य रामो ददौ दिव्यं जामदग्न्यो महात्मन:।
शरमाकर्णदेशान्तमयमाकृष्यतामिति॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
उस बिजली की गड़गड़ाहट के समान गर्जना सुनकर सभी प्राणी भयभीत हो गए। उस समय दशरथपुत्र भगवान राम ने परशुरामजी से कहा - 'ब्रह्मन्! मैंने इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दी है, अब मैं आपके लिए और क्या कर सकता हूँ?' तब जमदग्निपुत्र परशुराम ने महात्मा श्री रामचंद्रजी को एक दिव्य बाण देकर कहा - 'इसे धनुष पर चढ़ाकर अपने कान तक खींचो।'
 
All beings got frightened on hearing that thunder like thunder of lightning. At that time, Lord Rama, the son of Dasharath, said to Parshuramji - 'Brahman! I have strung this bow, what more can I do for you now?' Then, Parshuram, the son of Jamadagni, gave a divine arrow to Mahatma Shri Ramchandraji and said - 'Put it on the bow and pull it till your ear'.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas