श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  3.99.49 
तमेवंवादिनं तत्र रामो वचनमब्रवीत्।
अलं वै व्यपदेशेन धनुरायच्छ राघव॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
श्री रामचंद्रजी के ऐसा कहने पर परशुरामजी बोले - 'रघुनंदन! कथा गढ़ने की आवश्यकता नहीं है। यह धनुष लो और इस पर प्रत्यंचा चढ़ाओ।'॥49॥
 
When Shri Ramchandraji said this, Parshuramji said - 'Raghunandan! There is no need to make up stories. Take this bow and string it.'॥ 49॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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