श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 42-43
 
 
श्लोक  3.99.42-43 
ऋचीकनन्दनो रामो भार्गवो रेणुकासुत:।
तस्य दाशरथे: श्रुत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मण:॥ ४२॥
कौतूहलान्वितो रामस्त्वयोध्यामगमत् पुन:।
धनुरादाय तद् दिव्यं क्षत्रियाणां निबर्हणम्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
बिना किसी प्रयास के महान् कर्म करने वाले दशरथपुत्र भगवान् राम के महान पराक्रम की बात सुनकर भृगु और ऋचीक के वंशज रेणुकानंदन परशुराम उन्हें देखने के लिए उत्सुक होकर क्षत्रियों का संहार करने में समर्थ दिव्य धनुष से सुसज्जित होकर अयोध्या में आये ॥42-43॥
 
Hearing of the great valour of Lord Rama, the son of Dasharatha, who performed great deeds without any effort, Renukanandan Parashurama, the descendant of Bhrigu and Richik, eager to see him, came to Ayodhya armed with the divine bow capable of killing Kshatriyas. ॥ 42-43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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