श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 40-41
 
 
श्लोक  3.99.40-41 
लोमश उवाच
शृणु रामस्य राजेन्द्र भार्गवस्य च धीमत:।
जातो दशरथस्यासीत् पुत्रो रामो महात्मन:॥ ४०॥
विष्णु: स्वेन शरीरेण रावणस्य वधाय वै।
पश्यामस्तमयोध्यायां जातं दाशरथिं तत:॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
लोमशजी बोले- राजेन्द्र! तुम दशरथनन्दन श्री राम और परम बुद्धिमान भृगुनंदन परशुरामजी का चरित्र सुनो। प्राचीन काल में भगवान विष्णु ने महात्मा राजा दशरथ के यहाँ अपने सच्चिदानन्दमय देवग्रह से साक्षात् श्री राम के रूप में अवतार लिया था। उनके अवतार का उद्देश्य पापी रावण का विनाश करना था। अयोध्या में प्रकट हुए दशरथनन्दन श्री राम का हम लोगों ने प्रायः दर्शन किया था। 40-41॥
 
Lomashji said- Rajendra! You listen to the character of Dashrathanandan Shri Ram and the most intelligent Bhrigunandan Parashuramji. In ancient times, Lord Vishnu had personally incarnated in the form of Shri Ram from his own Sachchidanandamay Deegrah at the place of Mahatma King Dasharatha. The purpose of his incarnation was to destroy the sinful Ravana. We often had darshan of Dashrathanandan Shri Ram who appeared in Ayodhya. 40-41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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