श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  3.99.4-5 
अथाब्रवीदगस्त्यस्तान् राजर्षीनृषिसत्तम:।
विषादो वो न कर्तव्यो ह्यहं भोक्ष्ये महासुरम्॥ ४॥
धुर्यासनमथासाद्य निषसाद महानृषि:।
तं पर्यवेषद् दैत्येन्द्र इल्वल: प्रहसन्निव॥ ५॥
 
 
अनुवाद
तब महर्षि अगस्त्य ने उन राजर्षियों से (आश्वासन देते हुए) कहा - ‘आप लोग चिन्ता न करें। मैं इस महादैत्य को खा जाऊँगा।’ ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्य मुख्य आसन पर बैठ गए और दैत्यराज इल्वल ने हँसते हुए उन्हें मांस परोसा।
 
Then the great sage Agastya said to those royal sages (giving assurance) – ‘You people should not worry. I will eat this great demon.' Saying this, Maharishi Agastya sat on the main seat and the demon king Ilval laughingly served him the meat. 4-5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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