श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.99.37 
वैशम्पायन उवाच
स तत्र भ्रातृभिश्चैव कृष्णया चैव पाण्डव:।
स्नात्वा देवान् पितृृंश्चैव तर्पयामास भारत॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन जी कहते हैं: हे जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ उस पवित्र स्थान में स्नान किया और देवताओं तथा पितरों का तर्पण किया।
 
Vaishmpayana says: O Janamejaya! Then King Yudhishthira, along with his brothers and Draupadi, took a bath in that holy place and offered oblations to the gods and forefathers.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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