श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  3.99.32 
प्रतार्यमाणा कूटेषु यथा निम्नेषु नित्यश:।
शिलातलेषु संत्रस्ता पन्नगेन्द्रवधूरिव॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
धीरे-धीरे वह नीचे की ओर गिरता हुआ, और भी वेग से बहता हुआ, चट्टानों के नीचे लुप्त हो जाता है, मानो कोई भयभीत सर्प अपने बिल में जा रहा हो ॥32॥
 
Gradually it falls on lower and lower peaks, flowing ever faster and disappears beneath the rocks, as if a frightened serpent were going into its hole. ॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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