श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  3.99.23 
लोमश उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय तया समभवन्मुनि:।
समये समशीलिन्या श्रद्धावाञ्छ्रद्दधानया॥ २३॥
 
 
अनुवाद
लोमशजी कहते हैं- राजन! तब ‘तथास्तु’ कहकर भक्त महात्मा अगस्त्य उचित समय पर अपनी भक्त पत्नी लोपामुद्रा से मिले, जो समान आचरण और आचरण वाली थी॥23॥
 
Lomashji says- Rajan! Then saying 'Tathaastu', devotee Mahatma Agastya met at the right time with his devotee wife Lopamudra who was of similar conduct and conduct. 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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