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mahabharat 3.99.22: लोपामुद्रा बोली - हे तपस्वी! मुझे एक ही ऐसा गुणवान पुत्र मिले जो हजारों पुत्रों के समान हो; क्योंकि एक ही विद्वान् और गुणवान पुत्र अनेक दुष्ट पुत्रों से श्रेष्ठ माना जाता है।   |   mahabharat अध्याय 3.99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.99.22 
लोपामुद्रोवाच
सहस्रसम्मित: पुत्र एकोऽप्यस्तु तपोधन।
एको हि बहुभि: श्रेयान् विद्वान् साधुरसाधुभि:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
लोपामुद्रा बोली - हे तपस्वी! मुझे एक ही ऐसा गुणवान पुत्र मिले जो हजारों पुत्रों के समान हो; क्योंकि एक ही विद्वान् और गुणवान पुत्र अनेक दुष्ट पुत्रों से श्रेष्ठ माना जाता है।
 
Lopamudra said - O ascetic! May I get just one virtuous son who is equal to thousands of others; because a single learned and virtuous son is considered better than many wicked sons.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)