श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.99.21 
सहस्रं तेऽस्तु पुत्राणां शतं वा दशसम्मितम्।
दश वा शततुल्या: स्युरेको वापि सहस्रजित्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
क्या तुम्हारे गर्भ से दस पुत्रों के बराबर हजार या सौ पुत्र उत्पन्न होने चाहिए? अथवा केवल दस पुत्र ही होने चाहिए, जो सौ पुत्रों के बराबर हों? अथवा केवल एक ही पुत्र हो, जो हजारों को जीत ले?॥21॥
 
Should a thousand or a hundred sons be born from your womb, who are equal to ten? Or should there be only ten sons, who are equal to a hundred sons? Or should there be only one son, who conquers thousands?॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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