श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.99.15 
मह्यं ततो वै द्विगुणं रथश्चैव हिरण्मय:।
मनोजवौ वाजिनौ च दित्सितं ते महासुर॥ १५॥
 
 
अनुवाद
हे राक्षसराज! आपने मुझे इन राजाओं से दुगुनी गौएँ और स्वर्ण मुद्राएँ देने का निश्चय किया है। इसके अतिरिक्त आप मुझे मन के समान वेगवान दो घोड़ों से जुता हुआ एक स्वर्ण रथ भी देना चाहते हैं।॥ 15॥
 
You have decided to give me twice as many cows and gold coins as these kings. O great demon! Besides this, you want to give me a golden chariot drawn by two horses as fast as the mind.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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