श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.99.12 
एते च नातिधनिनो धनार्थश्च महान् मम।
यथाशक्त्यविहिंस्यान्यान् संविभागं प्रयच्छ न:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
‘यह राजा बहुत धनवान नहीं है और मुझे बहुत धन की आवश्यकता है। अतः अन्य प्राणियों को कष्ट न देते हुए, अपनी शक्ति के अनुसार हमें भी अपने धन का कुछ भाग दे दीजिए।’॥12॥
 
‘This king is not very rich and I need a lot of money. So without causing trouble to other living beings, give us some part of your wealth as per your capacity.'॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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