श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 99: अगस्त्यजीका इल्वलके यहाँ धनके लिये जाना, वातापि तथा इल्वलका वध,लोपामुद्राको पुत्रकी प्राप्ति तथा श्रीरामके द्वारा हरे हुए तेजकी परशुरामजीको तीर्थस्नानद्वारा पुन: प्राप्ति  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.99.10 
प्राञ्जलिश्च सहामात्यैरिदं वचनमब्रवीत्।
किमर्थमुपयाता: स्थ ब्रूत किं करवाणि व:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने और उनके मन्त्रियों ने हाथ जोड़कर उन अतिथियों से पूछा, 'बताइए, आपके आने का क्या प्रयोजन है? मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?'॥10॥
 
With folded hands he and his ministers asked these guests, 'Tell me, what is the purpose of your visit? What service can I render to you?'॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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