श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 97: महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.97.8 
प्राप्य भार्यामगस्त्यस्तु लोपामुद्रामभाषत।
महार्हाण्युत्सृजैतानि वासांस्याभरणानि च॥ ८॥
 
 
अनुवाद
लोपामुद्रा को पत्नी रूप में प्राप्त करके महर्षि अगस्त्य ने उससे कहा, "तुम्हारे वस्त्र और आभूषण बहुत ही मूल्यवान हैं। इन्हें उतार दो।" ॥8॥
 
On receiving Lopamudra as his wife, Maharishi Agastya told her, "Your clothes and ornaments are very precious. Take them off." ॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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