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श्लोक 3.97.22  |
अगस्त्य उवाच
एवमेतद् यथाऽऽत्थ त्वं तपोव्ययकरं तु तत्।
यथा तु मे न नश्येत तपस्तन्मां प्रचोदय॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| अगस्त्य बोले - हे प्रिये! आपकी बात तो ठीक है। परन्तु ऐसा करने से मेरी तपस्या नष्ट हो जाएगी। मुझे कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरी तपस्या नष्ट न हो। |
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| Agastya said - Dear! What you are saying is correct. But doing this will destroy my penance. Tell me a way so that my penance is not destroyed. |
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