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mahabharat 3.97.22: अगस्त्य बोले - हे प्रिये! आपकी बात तो ठीक है। परन्तु ऐसा करने से मेरी तपस्या नष्ट हो जाएगी। मुझे कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरी तपस्या नष्ट न हो।   |   mahabharat अध्याय 3.97: महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 97: महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.97.22 
अगस्त्य उवाच
एवमेतद् यथाऽऽत्थ त्वं तपोव्ययकरं तु तत्।
यथा तु मे न नश्येत तपस्तन्मां प्रचोदय॥ २२॥
 
 
अनुवाद
अगस्त्य बोले - हे प्रिये! आपकी बात तो ठीक है। परन्तु ऐसा करने से मेरी तपस्या नष्ट हो जाएगी। मुझे कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरी तपस्या नष्ट न हो।
 
Agastya said - Dear! What you are saying is correct. But doing this will destroy my penance. Tell me a way so that my penance is not destroyed.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)