श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 97: महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  3.97.21 
लोपामुद्रोवाच
ईशोऽसि तपसा सर्वं समाहर्तुं तपोधन।
क्षणेन जीवलोके यद् वसु किंचन विद्यते॥ २१॥
 
 
अनुवाद
लोपामुद्रा बोलीं - हे तपस्वी! आप अपनी तपस्या के बल से क्षण भर में इस संसार की समस्त सम्पत्ति एकत्रित करने में समर्थ हैं।
 
Lopamudra said - O ascetic! You are capable of collecting all the wealth in this world in a moment by the power of your austerity.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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