श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 97: महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  3.97.20 
अगस्त्य उवाच
न ते धनानि विद्यन्ते लोपामुद्रे तथा मम।
यथाविधानि कल्याणि पितुस्तव सुमध्यमे॥ २०॥
 
 
अनुवाद
अगस्त्य बोले, "हे सुन्दर कमर वाली कल्याणी लोपामुद्रा! तुम्हारे पिता के घर में जैसा धन और वैभव है, वैसा न तो तुम्हारे पास है और न मेरे पास (फिर यह कैसे सम्भव है?)"
 
Agastya said, "O Kalyani Lopamudra with a beautiful waist! The kind of wealth and splendor that your father has in his house, neither you nor I have it (then how is this possible?)"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)