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श्लोक 3.97.2  |
राजन्निवेशे बुद्धिर्मे वर्तते पुत्रकारणात्।
वरये त्वां महीपाल लोपामुद्रां प्रयच्छ मे॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| ‘राजन्! मैं पुत्र प्राप्ति हेतु विवाह करने का विचार कर रही हूँ। अतः हे राजन्! मैं आपकी पुत्री को स्वीकार करती हूँ। कृपया मुझे लोपामुद्रा प्रदान करें।’॥2॥ |
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| ‘King! I am thinking of getting married to have a son. Therefore, O King! I accept your daughter. Please give me Lopamudra.’॥2॥ |
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