श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 97: महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.97.2 
राजन्निवेशे बुद्धिर्मे वर्तते पुत्रकारणात्।
वरये त्वां महीपाल लोपामुद्रां प्रयच्छ मे॥ २॥
 
 
अनुवाद
‘राजन्! मैं पुत्र प्राप्ति हेतु विवाह करने का विचार कर रही हूँ। अतः हे राजन्! मैं आपकी पुत्री को स्वीकार करती हूँ। कृपया मुझे लोपामुद्रा प्रदान करें।’॥2॥
 
‘King! I am thinking of getting married to have a son. Therefore, O King! I accept your daughter. Please give me Lopamudra.’॥2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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