श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 97: महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  3.97.18 
इच्छामि त्वां स्रग्विणं च भूषणैश्च विभूषितम्।
उपसर्तुं यथाकामं दिव्याभरणभूषिता॥ १८॥
 
 
अनुवाद
मैं चाहती हूँ कि आप सुन्दर हारों और आभूषणों से विभूषित हों और मैं भी दिव्य आभूषणों से विभूषित होकर अपनी इच्छानुसार आपके साथ समागम का सुख भोगूँ॥18॥
 
'I want that you be adorned with beautiful necklaces and ornaments and that I too be adorned with divine ornaments and experience the pleasure of intercourse with you as per my desire.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)