श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 97: महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.97.15 
तत: सा प्राञ्जलिर्भूत्वा लज्जमानेव भाविनी।
तदा सप्रणयं वाक्यं भगवन्तमथाब्रवीत्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
तब भक्तवत् लोपामुद्रा कुछ लज्जित होकर हाथ जोड़कर बड़े प्रेम से भगवान अगस्त्य से बोलीं-॥15॥
 
Then the devotee Lopamudra, feeling somewhat embarrassed, folded her hands and spoke to Lord Agastya with great love -॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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