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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 97: महर्षि अगस्त्यका लोपामुद्रासे विवाह, गंगाद्वारमें तपस्या एवं पत्नीकी इच्छासे धनसंग्रहके लिये प्रस्थान  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.97.1 
लोमश उवाच
यदा त्वमन्यतागस्त्यो गार्हस्थ्ये तां क्षमामिति।
तदाभिगम्य प्रोवाच वैदर्भं पृथिवीपतिम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
लोमश कहते हैं: युधिष्ठिर! जब अगस्त्य मुनि को यह ज्ञात हुआ कि विदर्भ की राजकुमारी उनके गृह-संचालन में समर्थ हो गई है, तब वे विदर्भराज के पास जाकर बोले: ॥1॥
 
Lomasha says: Yudhishthira! When sage Agastya came to know that the princess of Vidarbha had become capable of managing his household, he went to the king of Vidarbha and said: ॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)