श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 96: इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.96.27 
सा स्म दासीशतवृता मध्ये कन्याशतस्य च।
आस्ते तेजस्विनी कन्या रोहिणीव दिवि प्रभा॥ २७॥
 
 
अनुवाद
सौ दासियों और सौ कन्याओं में वह तेजस्वी कन्या आकाश में सूर्य और तारों में रोहिणी के समान शोभायमान थी ॥27॥
 
Among the hundred maids and hundred girls, that bright girl was as beautiful as the sun in the sky and Rohini in the stars. 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)