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mahabharat 3.96.14: इन्हीं दिनों भगवान अगस्त्य मुनि कहीं जा रहे थे। एक स्थान पर उन्होंने अपने पूर्वजों को एक गड्ढे में मुँह के बल लटके हुए देखा॥14॥   |   mahabharat अध्याय 3.96: इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 96: इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.96.14 
अगस्त्यश्चापि भगवानेतस्मिन् काल एव तु।
पितॄन् ददर्श गर्ते वै लम्बमानानधोमुखान्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
इन्हीं दिनों भगवान अगस्त्य मुनि कहीं जा रहे थे। एक स्थान पर उन्होंने अपने पूर्वजों को एक गड्ढे में मुँह के बल लटके हुए देखा॥14॥
 
During these days, Lord Agastya Muni was going somewhere. At one place, he saw his ancestors hanging face down in a pit.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)