श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 96: इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  3.96.11-12 
तामिल्वलेन महता स्वरेण वाचमीरिताम्।
श्रुत्वातिमायो बलवान् क्षिप्रं ब्राह्मणकण्टक:॥ ११॥
तस्य पार्श्वं विनिर्भिद्य ब्राह्मणस्य महासुर:।
वातापि: प्रहसन् राजन्निश्चक्राम विशाम्पते॥ १२॥
 
 
अनुवाद
राजन! इल्वल की कही हुई ऊँची वाणी सुनकर ब्राह्मण का शत्रु वह अत्यंत कपटी और बलवान दैत्य वातापि उस ब्राह्मण की पसली फाड़कर हँसता हुआ बाहर निकल आया।
 
King! On hearing the loud voice spoken by Ilval, that extremely deceptive and powerful demon Vatapi, the enemy of the Brahmin, tore the rib of that Brahmin and came out laughing.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)