श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 96: इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  3.96.1 
वैशम्पायन उवाच
तत: सम्प्रस्थितो राजा कौन्तेयो भूरिदक्षिण:।
अगस्त्याश्रममासाद्य दुर्जयायामुवास ह॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! तदनन्तर प्रचुर दक्षिणा देने वाले कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिर गया छोड़कर अगस्त्य आश्रम में चले गये और दुर्जय मणिमती नगर में निवास करने लगे। 1॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, Kuntinandan king Yudhishthir, who gave abundant dakshina, left Gaya and went to Agastya Ashram and resided in Durjay Manimati city. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)