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mahabharat 3.95.6-8h: उन निष्पाप महात्माओं ने (त्रिवेणी के तट पर) ब्राह्मणों को धन दान दिया। भरतनंदन! तत्पश्चात पाण्डव ब्राह्मणों सहित तपस्वियों द्वारा सेवित ब्रह्माजी की वेदी पर गए। वे वीर वहाँ घोर तपस्या करते हुए निवास करने लगे। वे सदैव कंद, मूल, फल आदि वन्य पदार्थों से ब्राह्मणों को तृप्त करते रहे।   |   mahabharat अध्याय 3.95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना  »  श्लोक 6-8h
 
 
श्लोक  3.95.6-8h 
विपाप्मानो महात्मानो विप्रेभ्य: प्रददुर्वसु।
तपस्विजनजुष्टां च ततो वेदीं प्रजापते:॥ ६॥
जग्मु: पाण्डुसुता राजन् ब्राह्मणै: सह भारत।
तत्र ते न्यवसन् वीरास्तपश्चातस्थुरुत्तमम्॥ ७॥
संतर्पयन्त: सततं वन्येन हविषा द्विजान्।
 
 
अनुवाद
उन निष्पाप महात्माओं ने (त्रिवेणी के तट पर) ब्राह्मणों को धन दान दिया। भरतनंदन! तत्पश्चात पाण्डव ब्राह्मणों सहित तपस्वियों द्वारा सेवित ब्रह्माजी की वेदी पर गए। वे वीर वहाँ घोर तपस्या करते हुए निवास करने लगे। वे सदैव कंद, मूल, फल आदि वन्य पदार्थों से ब्राह्मणों को तृप्त करते रहे।
 
Those sinless saints donated money to the Brahmins (on the banks of Triveni). Bharatnandan! After that, the Pandavas along with the Brahmins went to the altar of Brahmaji, which is served by the ascetics. Those heroes resided there performing great penance. He always kept satisfying the Brahmins with wild offerings like tubers, roots, fruits etc. 6-7 1/2"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)