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mahabharat 3.95.29: हे कुरुपुत्र! महाराज गय के ऐसे अनेक यज्ञ इसी ब्रह्मसरोवर के निकट सम्पन्न हुए हैं।   |   mahabharat अध्याय 3.95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.95.29 
एवंविधा: सुबहवस्तस्य यज्ञा महीपते:।
बभूवुरस्य सरस: समीपे कुरुनन्दन॥ २९॥
 
 
अनुवाद
हे कुरुपुत्र! महाराज गय के ऐसे अनेक यज्ञ इसी ब्रह्मसरोवर के निकट सम्पन्न हुए हैं।
 
O son of Kuruṇā! Many such yajnas of Maharaja Gaya have been performed near this Brahmasarovar. 29
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां गययज्ञकथने पञ्चनवतितमोऽध्याय:॥ ९५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमश-तीर्थयात्राके प्रसंगमें ‘गयके यज्ञका वर्णन’-विषयक पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)