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mahabharat 3.95.28: ‘जैसे इस संसार में बालू के कण, आकाश के तारे और गिरते हुए बादलों से निकलने वाली जलधाराएँ कोई नहीं गिन सकता, वैसे ही गया के यज्ञ में दी गई आहुति भी कोई नहीं गिन सकता॥ 28॥   |   mahabharat अध्याय 3.95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  3.95.28 
सिकता वा यथा लोके यथा वा दिवि तारका:।
यथा वा वर्षतो धारा असंख्येया: स्म केनचित्।
तथा गणयितुं शक्या गययज्ञे न दक्षिणा:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
‘जैसे इस संसार में बालू के कण, आकाश के तारे और गिरते हुए बादलों से निकलने वाली जलधाराएँ कोई नहीं गिन सकता, वैसे ही गया के यज्ञ में दी गई आहुति भी कोई नहीं गिन सकता॥ 28॥
 
‘Just as the grains of sand in this world, the stars in the sky and the streams of water from the falling clouds cannot be counted by anyone, similarly the offerings made in the yajna of Gaya also could not be counted by anyone.॥ 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)