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mahabharat 3.95.23-24: राजन! वहाँ सर्वत्र फैले हुए पुण्य वचनों से पृथ्वी, दिशाएँ, स्वर्ग और आकाश भर गए। यह बड़ी अद्भुत बात थी। भरतश्रेष्ठ! उस यज्ञ में सभी लोग यह गान करते रहे कि 'इस यज्ञ में प्रत्येक देश के श्रेष्ठतम तेजस्वी पुरुष उत्तम भोजन और पेय से तृप्त हो रहे हैं।' 23-24॥   |   mahabharat अध्याय 3.95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  3.95.23-24 
पुण्येन चरता राजन् भूर्दिश: खं नभस्तथा।
आपूर्णमासीच्छब्देन तदप्यासीन्महाद्‍भुतम्॥ २३॥
यत्र स्म गाथा गायन्ति मनुष्या भरतर्षभ।
अन्नपानै: शुभैस्तृप्ता देशे देशे सुवर्चस:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
राजन! वहाँ सर्वत्र फैले हुए पुण्य वचनों से पृथ्वी, दिशाएँ, स्वर्ग और आकाश भर गए। यह बड़ी अद्भुत बात थी। भरतश्रेष्ठ! उस यज्ञ में सभी लोग यह गान करते रहे कि 'इस यज्ञ में प्रत्येक देश के श्रेष्ठतम तेजस्वी पुरुष उत्तम भोजन और पेय से तृप्त हो रहे हैं।' 23-24॥
 
Rajan! The earth, directions, heaven and sky were filled with the virtuous words spread everywhere there. This was a very amazing thing. Bharatshrestha! In that Yagya, all the people kept singing this song that 'In this Yagya, the most brilliant men of every country are getting satisfied with the best food and drink'. 23-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)