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mahabharat 3.95.22: भरतनंदन! उस यज्ञ में दक्षिणा देते समय वेद मंत्रों की ध्वनि स्वर्ग तक गूँजती थी। उस वेद ध्वनि के सामने कोई अन्य शब्द सुनाई नहीं देता था। 22॥   |   mahabharat अध्याय 3.95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  3.95.22 
तत्र वै दक्षिणाकाले ब्रह्मघोषो दिवं गत:।
न च प्रज्ञायते किंचिद् ब्रह्मशब्देन भारत॥ २२॥
 
 
अनुवाद
भरतनंदन! उस यज्ञ में दक्षिणा देते समय वेद मंत्रों की ध्वनि स्वर्ग तक गूँजती थी। उस वेद ध्वनि के सामने कोई अन्य शब्द सुनाई नहीं देता था। 22॥
 
Bharatnandan! The sound of Veda mantras while giving Dakshina in that Yagya used to echo till heaven. No other word could be heard in front of that Veda sound. 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)