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mahabharat 3.95.19-20: महाराज! राजा गय ने यहाँ एक विशाल यज्ञ किया था। उसमें बहुत सारा अन्न व्यय हुआ और असंख्य दक्षिणा बाँटी गई। उस यज्ञ में सैकड़ों-हजारों अन्न के पर्वत लगे। घी के सैकड़ों कुंड और दही की नदियाँ बहीं। हजारों प्रकार के उत्तम व्यंजनों की बाढ़ आ गई।   |   mahabharat अध्याय 3.95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना  »  श्लोक 19-20
 
 
श्लोक  3.95.19-20 
यस्य यज्ञो बभूवेह बह्वन्नो बहुदक्षिण:।
यत्रान्नपर्वता राजन् शतशोऽथ सहस्रश:॥ १९॥
घृतकुल्याश्च दध्नश्च नद्यो बहुशतास्तथा।
व्यञ्जनानां प्रवाहाश्च महार्हाणां सहस्रश:॥ २०॥
 
 
अनुवाद
महाराज! राजा गय ने यहाँ एक विशाल यज्ञ किया था। उसमें बहुत सारा अन्न व्यय हुआ और असंख्य दक्षिणा बाँटी गई। उस यज्ञ में सैकड़ों-हजारों अन्न के पर्वत लगे। घी के सैकड़ों कुंड और दही की नदियाँ बहीं। हजारों प्रकार के उत्तम व्यंजनों की बाढ़ आ गई।
 
King! King Gaya had performed a huge yagya here. A lot of food was spent in it and innumerable dakshina was distributed. Hundreds and thousands of mountains of food were used in that yagya. Several hundred pools of ghee and rivers of curd flowed. There was a flood of thousands of types of excellent dishes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)