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mahabharat 3.95.15: उस तीर्थस्थान पर पाण्डवों ने अविचल मन से अनेक व्रत किये। उस समय वहाँ सैकड़ों तपस्वी ब्राह्मण आये॥15॥   |   mahabharat अध्याय 3.95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  3.95.15 
ते तु तत्रोपवासांस्तु चक्रुर्निश्चितमानसा:।
ब्राह्मणास्तत्र शतश: समाजग्मुस्तपोधना:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
उस तीर्थस्थान पर पाण्डवों ने अविचल मन से अनेक व्रत किये। उस समय वहाँ सैकड़ों तपस्वी ब्राह्मण आये॥15॥
 
The Pandavas with unwavering minds observed many fasts at that place of pilgrimage. At that time hundreds of ascetic Brahmins arrived there.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)