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mahabharat 3.95.14: देवताओं की वह यज्ञभूमि अक्षय है और वहाँ किए गए प्रत्येक शुभ कर्म का फल अक्षय है ॥14॥   |   mahabharat अध्याय 3.95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 95: पाण्डवोंका नैमिषारण्य आदि तीर्थोंमें जाकर प्रयाग तथा गयातीर्थमें जाना और गय राजाके महान् यज्ञोंकी महिमा सुनना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.95.14 
अक्षये देवयजने अक्षयं यत्र वै फलम्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
देवताओं की वह यज्ञभूमि अक्षय है और वहाँ किए गए प्रत्येक शुभ कर्म का फल अक्षय है ॥14॥
 
That sacrificial ground of the gods is inexhaustible, and the fruits of every good deed performed there are inexhaustible. ॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)