श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 94: देवताओं और धर्मात्मा राजाओंका उदाहरण देकर महर्षि लोमशका युधिष्ठिरको अधर्मसे हानि बताना और तीर्थयात्राजनित पुण्यकी महिमाका वर्णन करते हुए आश्वासन देना  »  श्लोक 20-22
 
 
श्लोक  3.94.20-22 
यथा चेक्ष्वाकुरभवत् सपुत्रजनबान्धव:॥ २०॥
मुचुकुन्दोऽथ मान्धाता मरुत्तश्च महीपति:।
कीर्तिं पुण्यामविन्दन्त यथा देवास्तपोबलात्॥ २१॥
देवर्षयश्च कात्‍स्‍न्‍‍‍र्येन तथा त्वमपि वेत्स्यसि।
धार्तराष्ट्रास्त्वधर्मेण मोहेन च वशीकृता:।
न चिराद् वै विनङ्क्ष्यन्ति दैत्या इव न संशय:॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जैसे राजा इक्ष्वाकु, मुचुकुन्द, मान्धाता और महाराज मरुत्त ने अपने पुत्रों, सेवकों और सम्बन्धियों सहित पुण्य कीर्ति प्राप्त की, जैसे देवताओं और ऋषियों ने तप के बल से यश और ऐश्वर्य प्राप्त किया, वैसे ही तुम भी पूर्ण यश और ऐश्वर्य प्राप्त करोगे। धृतराष्ट्र के पुत्र पाप और मोह के वश में हैं, अतः वे राक्षसों की भाँति शीघ्र ही नष्ट हो जाएँगे, इसमें संशय नहीं है।
 
Just as King Ikshwaku, Muchukunda, Mandhaata and Maharaja Marutta, along with their sons, servants and relatives, achieved virtuous fame, just as the gods and sages achieved fame and prosperity through the power of penance; similarly you too will achieve full fame and wealth. The sons of Dhritarashtra are under the influence of sin and delusion; therefore, they will be destroyed soon like demons; there is no doubt about this.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां चतुर्नवतितमोऽध्याय:॥ ९४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९४॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २३ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)