यथैव हि नृगो राजा शिबिरौशीनरो यथा॥ १७॥
भगीरथो वसुमना गय: पूरु: पुरूरवा:।
चरमाणास्तपो नित्यं स्पर्शनादम्भसश्च ते॥ १८॥
तीर्थाभिगमनात् पूता दर्शनाच्च महात्मनाम्।
अलभन्त यश: पुण्यं धनानि च विशाम्पते॥ १९॥
तथा त्वमपि राजेन्द्र लब्धासि विपुलां श्रियम्।
अनुवाद
जैसे नृग, उशीनरपुत्र शिबि, भगीरथ, वसुमान, गय, पुरु और पुरुरवा आदि राजा सदैव तपस्यापूर्वक तीर्थयात्रा करते थे और वहाँ के जल का स्पर्श करके तथा महात्माओं के दर्शन करके पुण्य कीर्ति और प्रचुर धन प्राप्त करते थे, उसी प्रकार तुम भी तीर्थयात्रा के पुण्य से अपार धन प्राप्त करोगे॥ 17-19 1/2॥
Just as kings like Nriga, Ushinarputra Sibi, Bhagiratha, Vasumana, Gaya, Puru and Pururava always performed pilgrimages with austerity and by touching the water there and by meeting the great souls, they attained holy fame and abundant wealth; in the same way, you too will acquire immense wealth by the virtue of pilgrimage.॥ 17-19 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)