श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 93: ऋषियोंको नमस्कार करके पाण्डवोंका तीर्थयात्राके लिये विदा होना  »  श्लोक 8-9
 
 
श्लोक  3.93.8-9 
भवानपि नरेन्द्रस्य कार्तवीर्यस्य भारत।
अष्टकस्य च राजर्षेर्लोमपादस्य चैव ह॥ ८॥
भरतस्य च वीरस्य सार्वभौमस्य पार्थिव।
ध्रुवं प्राप्स्यसि दुष्प्रापाँल्लोकांस्तीर्थपरिप्लुत:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
भूपाल! भरतनन्दन! तीर्थों में स्नान करके तुम भी अवश्य ही उन दुर्लभ लोकों को प्राप्त करोगे, जो राजा कार्तवीर्य अर्जुन, राजर्षि अष्टक, लोमपाद और विश्वविख्यात सम्राट वीरवर भरत को प्राप्त हुए थे। 8-9॥
 
'Bhupal! Bharatnandan! By bathing in the holy places, you too will definitely attain the rare worlds that King Kartavirya Arjuna, Rajarshi Ashtaka, Lomapada and the world-famous Emperor Veervara Bharata get. 8-9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)