श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 93: ऋषियोंको नमस्कार करके पाण्डवोंका तीर्थयात्राके लिये विदा होना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  3.93.3 
अस्मानपि महाराज नेतुमर्हसि पाण्डव।
अस्माभिर्हि न शक्यानि त्वदृते तानि कौरव॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'कुरुकुलतिलक पाण्डुनन्दन! हमें अपने साथ ले चलो। महाराज! आपके बिना हम उन तीर्थों की यात्रा नहीं कर सकते।'
 
'Kurukultilaka Pandanunandan! Take us along with you. Maharaj! Without you we cannot visit those holy places.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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