| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 93: ऋषियोंको नमस्कार करके पाण्डवोंका तीर्थयात्राके लिये विदा होना » श्लोक 29 |
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| | | | श्लोक 3.93.29  | सायुधा बद्धनिस्त्रिंशास्तूणवन्त: समार्गणा:।
प्राङ्मुखा: प्रययुर्वीरा: पाण्डवा जनमेजय॥ २९॥ | | | | | | अनुवाद | | जनमेजय! वीर पाण्डव आवश्यक अस्त्र-शस्त्र लेकर, कमर में तलवार बाँधकर, पीठ पर तरकश बाँधकर, हाथ में बाण लेकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके वहाँ से चले। | | | | Janamejaya! The valiant Pandavas, taking the necessary weapons, tying swords around their waists, quiver on their backs, arrows in their hands, proceeded from there facing the east. | | | इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां त्रिनवतितमोऽध्याय:॥ ९३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९३॥
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