श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 93: ऋषियोंको नमस्कार करके पाण्डवोंका तीर्थयात्राके लिये विदा होना  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  3.93.25-26 
लोमशस्योपसंगृह्य पादौ द्वैपायनस्य च।
नारदस्य च राजेन्द्र देवर्षे: पर्वतस्य च॥ २५॥
धौम्येन सहिता वीरास्तथा तैर्वनवासिभि:।
मार्गशीर्ष्यामतीतायां पुष्येण प्रययुस्तत:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! तत्पश्चात् महर्षि लोमश, द्वैपायन व्यास, देवर्षि नारद और पर्वत के चरण स्पर्श करके वीर पाण्डव वनवासी ब्राह्मणों, पुरोहित धौम्य और लोमश आदि के साथ तीर्थयात्रा के लिए चल पड़े। मार्गशीर्ष की पूर्णिमा बीत जाने पर जब पुष्य नक्षत्र आया, तब उन्होंने उसी नक्षत्र में अपनी यात्रा आरम्भ की। 25-26॥
 
Rajendra! Thereafter, after touching the feet of Maharishi Lomash, Dwaipayan Vyas, Devarshi Narad and the mountain, the brave Pandavas along with forest dweller Brahmins, priests Dhaumya and Lomash etc. set out for pilgrimage. When the Pushya Nakshatra arrived after the full moon of Margashirsha passed, he started his journey in the same Nakshatra. 25-26॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)