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mahabharat 3.93.10-12h: महिपाल! हम आपके साथ प्रभास आदि तीर्थों, महेन्द्र आदि पर्वतों, गंगा आदि नदियों और प्लक्ष आदि वृक्षों का दर्शन करना चाहते हैं। जनेश्वर! यदि आपके हृदय में ब्राह्मणों के प्रति कुछ भी प्रेम है, तो कृपया शीघ्र ही हमारी प्रार्थना स्वीकार करें; इससे आपको लाभ होगा।॥ 10-11 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 3.93: ऋषियोंको नमस्कार करके पाण्डवोंका तीर्थयात्राके लिये विदा होना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 93: ऋषियोंको नमस्कार करके पाण्डवोंका तीर्थयात्राके लिये विदा होना  »  श्लोक 10-12h
 
 
श्लोक  3.93.10-12h 
प्रभासादीनि तीर्थानि महेन्द्रादींश्च पर्वतान्।
गङ्गाद्या: सरितश्चैव प्लक्षादींश्च वनस्पतीन्॥ १०॥
त्वया सह महीपाल द्रष्टुमिच्छामहे वयम्।
यदि ते ब्राह्मणेष्वस्ति काचित् प्रीतिर्जनाधिप॥ ११॥
कुरु क्षिप्रं वचोऽस्माकं तत: श्रेयोऽभिपत्स्यसे।
 
 
अनुवाद
महिपाल! हम आपके साथ प्रभास आदि तीर्थों, महेन्द्र आदि पर्वतों, गंगा आदि नदियों और प्लक्ष आदि वृक्षों का दर्शन करना चाहते हैं। जनेश्वर! यदि आपके हृदय में ब्राह्मणों के प्रति कुछ भी प्रेम है, तो कृपया शीघ्र ही हमारी प्रार्थना स्वीकार करें; इससे आपको लाभ होगा।॥ 10-11 1/2॥
 
‘Mahipal! We want to visit the pilgrimage places like Prabhas, mountains like Mahendra, rivers like Ganga and trees like Plaksha with you. Janeshwar! If you have some love for Brahmins in your heart, then please accept our request quickly; this will be beneficial for you.॥ 10-11 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)