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श्लोक 3.93.1  |
वैशम्पायन उवाच
तत: प्रयान्तं कौन्तेयं ब्राह्मणा वनवासिन:।
अभिगम्य तदा राजन्निदं वचनमब्रुवन्॥ १॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को तीर्थयात्रा के लिए उत्सुक देखकर काम्यकवनवासी ब्राह्मण उनके पास आए और इस प्रकार बोले- 1॥ |
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| Vaishampayanji says- Rajan! Seeing Kunti's son Yudhishthira eager for a pilgrimage, the Brahmins resident of Kamyakavan came near him and said thus - 1॥ |
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