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mahabharat 3.92.17: अतः हे ब्रह्मन्! जब भी आप उचित समझें, मैं तीर्थों की यात्रा के लिए प्रस्थान करूँगा; यही मेरा अंतिम संकल्प है।   |   mahabharat अध्याय 3.92: महर्षि लोमशके मुखसे इन्द्र और अर्जुनका संदेश सुनकर युधिष्ठिरका प्रसन्न होना और तीर्थयात्राके लिये उद्यत हो अपने अधिक साथियोंको विदा करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 92: महर्षि लोमशके मुखसे इन्द्र और अर्जुनका संदेश सुनकर युधिष्ठिरका प्रसन्न होना और तीर्थयात्राके लिये उद्यत हो अपने अधिक साथियोंको विदा करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.92.17 
तद् यदा मन्यसे ब्रह्मन् गमनं तीर्थदर्शने।
तदैव गन्तास्मि तीर्थान्येष मे निश्चय: पर:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
अतः हे ब्रह्मन्! जब भी आप उचित समझें, मैं तीर्थों की यात्रा के लिए प्रस्थान करूँगा; यही मेरा अंतिम संकल्प है।
 
Therefore, O Brahman! Whenever you deem it fit, I shall set out to visit the holy places; this is my final resolution.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)