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mahabharat 3.92.12: आप सदैव धर्म में लगे रहते हैं, धर्म के जानकार हैं, सत्य के प्रति प्रतिबद्ध हैं और सभी प्रकार की आसक्तियों से मुक्त हैं तथा भविष्य में भी ये गुण आपमें अधिकाधिक विकसित होते रहेंगे।   |   mahabharat अध्याय 3.92: महर्षि लोमशके मुखसे इन्द्र और अर्जुनका संदेश सुनकर युधिष्ठिरका प्रसन्न होना और तीर्थयात्राके लिये उद्यत हो अपने अधिक साथियोंको विदा करना   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 92: महर्षि लोमशके मुखसे इन्द्र और अर्जुनका संदेश सुनकर युधिष्ठिरका प्रसन्न होना और तीर्थयात्राके लिये उद्यत हो अपने अधिक साथियोंको विदा करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.92.12 
त्वं तु धर्ममतिर्नित्यं धर्मज्ञ: सत्यसंगर:।
विमुक्त: सर्वसङ्गेभ्यो भूय एव भविष्यसि॥ १२॥
 
 
अनुवाद
आप सदैव धर्म में लगे रहते हैं, धर्म के जानकार हैं, सत्य के प्रति प्रतिबद्ध हैं और सभी प्रकार की आसक्तियों से मुक्त हैं तथा भविष्य में भी ये गुण आपमें अधिकाधिक विकसित होते रहेंगे।
 
You are always engaged in religion, knowledgeable in religion, committed to the truth and free from all kinds of attachments and in the future also these qualities will develop more and more in you.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)