श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 91: महर्षि लोमशका आगमन और युधिष्ठिरसे अर्जुनके पाशुपत आदि दिव्यास्त्रोंकी प्राप्तिका वर्णन तथा इन्द्रका संदेश सुनाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.91.5 
संचरन्नस्मि कौन्तेय सर्वा ँल्लोकान् यदृच्छया।
गत: शक्रस्य भवनं तत्रापश्यं सुरेश्वरम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
'कुन्तीनन्दन! मैं अपनी इच्छानुसार समस्त लोकों में विचरण करता हूँ। एक दिन मैं इन्द्र के महल में गया और वहाँ देवराज इन्द्र से मिला।
 
'Kuntinandan! I roam in all the worlds according to my wish. One day I went to Indra's palace and met Devraj Indra there.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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